जहा से चला था आज वही खड़ा हूँ
अंजानो से पता पूछता हुआ निकला हूँ
अपनों के सपनो में दबा हुआ
हकीकत से दूर भागता रहा हूँ
सच को जेब में दबा के
झूठ की कस्ती बना के बढ़ चला हूँ
सफर लम्बा रहा सब हुआ हासिल मगर
ख्वाबो से दूर अपनों से दूर हूँ
जहा से चला था वही खड़ा हुआ हूँ मैं

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