शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

          ------  KAithAl  ------
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?
गम है या ख़ुशी, जीत है या हार,
ना जाने ये कैसा एहसास है ।
हाथ तो कस के पकड़ा था उसने,
ना जाने कैसे छूट गया ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

एक ही सावन तो देखा था अभी ।
पतझड़ आते ही झड गया ।
पत्ता भी ना बना था ठीक से,
अभी से गिर गया ।
ना जाने ये कैसा एहसास है ।
जमी पे है या आसमा पे ,
ना जाने कहा उसे पता ही नहीं ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

अभी कल ही की बात है, कैथल
दो बच्चे बैठे थे उसकी छाव में,
कुछ बाते करते हुए।
कुछ मुस्कुराते ,कुछ चेहचहाते हुए,
कुछ अपनी मस्ती में ही मस्त ,
दींन दुनिया से दूर थे ।
ना जाने ये कैसा एहसास है ।

एक सोंधी सी मिट्टी आई थी उसके चहेरे पे,
कुछ चिडियों की चहचहाट, बारिश की वो बूंदे,
अभी छटी भी नहीं थी ।
की न जाने कब फिसल गया ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

अभी तो गुदगुदाहट भी बाकी है ,
वो गिलेहरियो की।
वो सुबह का उगता हुआ सूरज ।
चिडियों का चुगना याद है ।
तितलियों का बेठना,
वो भवरों की मस्ती ।
वो बच्चो की शरारत याद है ।
सब याद है ।
बस याद नहीं,
बस याद नहीं
कब गिरा शाख से पता ही न चला।
ना जाने कब क्या हुआ पता ही न चला।
शायद यही सोचता है शाख से गिरता हुआ पत्ता।
कब क्या हुआ पता ही ना चला।

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