मालतिया

ऎ मालतिया
जब तू है बेठी अपने घरोंदे मा
फुर्सत के पलन मे
पलकों को मूदे
यादो में खोई
तब तेरी उन यादन मा हम होवे है का

ऎ मालतिया
जब बारिश आवे है
फाग उड़े है
छलनी में दीप जले है
रेडिओ पे कही गीत बजे है
तब तोरे उन गीतन मा हम होवे है का

ऎ मालतिया
जब शाम ढले और रात आवे है
पीछे से जब कोई थपकी दे जावे है
जब कोई बार बार तोखा फ़ोन लगावे है
और जब तू डर के रोवे है
तब तोरे आंसू पोछे खातिर हम हुआ होवे है का

ऐ मलतिया
जब तू बीमार होत है
गुस्से में लाल होत है
मुह फुला के बैठ जात है
और जब तू चाटा मारत है
तब तोर ऊ चाटा खाए खातिर हम हुवा होत है का

ऐ मालतिया
जब हम खुश होत है
तोसे अपने दिल की बात कहत है
तोखा सब कुछ बतावत है
तोखा सुनावत है
और जब तू हमसे कुछ कहत है
तब तोर उन बातन का सुने खातिर हम हुवा होत है का

ऎ मालतिया
जब हम रात में अकेले रहत है
तू हमार साथ रहत है
हम बात करत है
हमका बाहन में समात है
हमार बालन मा उंगली फिरावर है
और जब तू अकेलीे रहत है
तब हम भी तोरे अकेले पन मा तोरे साथ होवे है का

ऎ मालतिया
और जब तोरी याद में
तोरी खातिर हम लिखत है
तो इ सब तू हमार खातिर पढ़त है का
ऎ मालतिया

नैन

एक तेरे नैन से मालतिया, जबसे मिले है मेरे नैन।
भूला कैथल ये जग सारा, बस तेरे नैन में है मेरे नैन।

भव सागर

मैं तो तेरे प्यार में मालतिया, भूल गया जग सारा।
कहे का भव सागर कैथल, कहे का सहारा जिसे तू लगाये किनारा।

सहारा

तेरे प्यार में होक पागल, फिरता हूँ मैं मतवाला।
कैथल जैसे उड़े पाके तिनका, तूफा का सहारा।

मालतिया फाग

तेरा फाग ऐसा चढ़ा, चढ़े ना दूजा कोये।
कोन से रंग से रंग दिया तूने ये मालतिया, जो प्रीत से भी गाढ़ा होये।

सीख

             ------- kAithAl -------

जिंदगी के चंद पलो में ही हम बहुत कुछ सीख गए
छोटी सी उम्र में ही हम बहुत कुछ सीख गए
फ़िक्र तो ये है, कि छुपाने और बताने को अब कुछ ना रहा
इतने से ही पालो में हम बहुत कुछ सीख गए
छोटी सी उम्र में ही हम बहुत कुछ सीख गए

यादे तसब्बुर में कितने राज छुपाये है हमने
वक़्त के साथ अब हम उन्हें छुपाना भी सीख गए

दिन ढले शाम तले कुछ बाते याद आती है
अब उन बातो को नज़र अंदाज करना भी हम सीख गए

सिखाया वक़्त ने या हम खुद ही सीख गए
जिंदगी के चंद पलो में ही हम बहुत कुछ सीख गए
छोटी सी उम्र में ही हम बहुत कुछ सीख गए
वक़्त के साथ अब हम अपने अशुओ को छुपाना भी सीख गए
छोटी सी उम्र में ही हम बहुत कुछ सीख गए

इंतिजार

          ------  KAithAl  ------
ये इंतिजार भी बड़ी अजीब चीज है
कैथल, आँखों से नींद ही चुरा लेती है ।
रात यू ही कट जाती है करवटो में,
कुछ तो बात जरुर होगी ।

कभी तो नींद आयेगी शायद, तब इंतिजार खत्म हो ।
कुछ आस अभी भी बाकी है, शायद उन्हें जी पाऊ ।
रात का एक पेहेर तो कटता नहीं ।
ना जाने जिन्दगी कैसे कटेगी ?

घर का वो आइना, आज भी तेरी राह तकता है ।
धुन्दला गया है अब वो भी, इंतिजार में ।
ये इंतिजार भी बड़ी अजीब चीज है ।

एक आखिरी तम्मना

      ------  KAithAl  ------
   >>एक आखिरी तम्मना<<
एक आखिरी तम्मना आखिरी ही रहेगी ।
साथ रहने की चाहत हमेशा बाकी ही रहेगी ।
चाहे गर्मी के दिन हो या शर्दी की राते ।
हमारी बात बाकी थी और बाकी ही रहेगी ।
कुछ अश्क तेरे दामन है कुछ मेरे,
उन्हें सुखाना तो पड़ेगा ।
कुछ राज है तेरे मेरे दर्मिया,
उन्हें छुपना तो पड़ेगा ।
अपने चेहरे में लगे आसुओ को पोछ लो ,
कही कोई देख ना ले ।
अपने अश्क खुद में ही समेट लो ,
कही कोई देख ना ले ।
यू ऐसे तो सब कुछ खत्म न होना था ।
कुछ आख़िरी लब्ज तुझे कहना था, कुछ मुझे।
इतने पल जो हमने बिताये थे उनका हिसाब भी देना था।
जाते जाते तो हम एक बार मिल पाते।
जो आखिरी अश्क थे तुझे वो भी तो देने थे ।
जाते जाते दो लफ्ज भी तो कहने थे ।

LAst poem


------  KAithAl  ------
एक छोटा सा सफ़र था हमारा
जाने कब कट गया
पता ही ना चला
कुछ मिठास समेटे हुए
कुछ तेरी बात समेटे हुए
कुछ उम्मीद कुछ आस
कुछ दर्द कुछ प्यार समेटे हुए
जाने कब कट गया पता ही ना चला
हे दुआ अब कि आगे का सफ़र भी
हो तेरा खुशियो से भरा
हर याद हर प्यार एहसास समेटे हुए
हो तब्जो सबसे पहले तेरी तेरे नए नए जीवन में हर दम
मिले हर उम्मीद हर खुशी हर कदम
तेरी मुस्कराहट सी हो तेरी जिन्दगी हर पल
रहे तू हर दम खुश हर याद हर ख़ुशी समेटे हुए
कुछ मिठास समेटे हुए
कुछ तेरी अपनी ही सी बात समेटे हुए

खामोश सा


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अपना भी अफसाना हुआ करता था।
खामोश सा ही सही।
तेरे पास हुआ करता था खामोश सा ही सही।
कुछ यादे उन यादो में है जो तेरे साथ है ,खामोश सी।
राज जो तूने तकिये के नीचे छुपाये थे।
कुछ बाते जो तूने उस रात बताई थी।
खामोश थी, पर थी तो सही।
कुछ अश्क बहाए थे हमने।
ना तुझे पता चला ना मुझे, इतने खामोश थे वो पल। खामोश ही सही जब तेरे पास थे, खामोश थे।
ख्वाबो के दर्मिया भी नहीं आते है पल।
भूल के भी नहीं बुलाते है वो नदिया के कल कल।
दर्द का अफसाना अब अपना न रहा।
याद आती है तेरी पर खमोश सी।

शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

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शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?
गम है या ख़ुशी, जीत है या हार,
ना जाने ये कैसा एहसास है ।
हाथ तो कस के पकड़ा था उसने,
ना जाने कैसे छूट गया ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

एक ही सावन तो देखा था अभी ।
पतझड़ आते ही झड गया ।
पत्ता भी ना बना था ठीक से,
अभी से गिर गया ।
ना जाने ये कैसा एहसास है ।
जमी पे है या आसमा पे ,
ना जाने कहा उसे पता ही नहीं ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

अभी कल ही की बात है, कैथल
दो बच्चे बैठे थे उसकी छाव में,
कुछ बाते करते हुए।
कुछ मुस्कुराते ,कुछ चेहचहाते हुए,
कुछ अपनी मस्ती में ही मस्त ,
दींन दुनिया से दूर थे ।
ना जाने ये कैसा एहसास है ।

एक सोंधी सी मिट्टी आई थी उसके चहेरे पे,
कुछ चिडियों की चहचहाट, बारिश की वो बूंदे,
अभी छटी भी नहीं थी ।
की न जाने कब फिसल गया ।
शाख से गिरता हुआ पत्ता सोचता है क्या ?

अभी तो गुदगुदाहट भी बाकी है ,
वो गिलेहरियो की।
वो सुबह का उगता हुआ सूरज ।
चिडियों का चुगना याद है ।
तितलियों का बेठना,
वो भवरों की मस्ती ।
वो बच्चो की शरारत याद है ।
सब याद है ।
बस याद नहीं,
बस याद नहीं
कब गिरा शाख से पता ही न चला।
ना जाने कब क्या हुआ पता ही न चला।
शायद यही सोचता है शाख से गिरता हुआ पत्ता।
कब क्या हुआ पता ही ना चला।

दूर

  जहा से चला था आज वही खड़ा हूँ  अंजानो से पता पूछता हुआ निकला हूँ  अपनों के सपनो में दबा हुआ  हकीकत से दूर भागता रहा हूँ सच को जेब में दबा क...

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